Saturday, May 30, 2009
गौर-फरमाएं वजीर-ए-आला!
दलित की बेटी हुकूमत कर रही है। ये एक बड़ा सामाजिक बदलाव है। नौकरशाही के तमाम अहम ओहदों पर भी इसी तबके के लोग बैठने लगे हैं। गांव के सबसे किनारे फूस और मिट्टी से बनी झोपड़ियों में बुनियादी जरूरतों से मोहताज ये तबका अब समाज की मुख्य धारा में है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का सपना साकार हो रहा है। बंजर धरती पर कुदाल-फावड़े से ढेले तोड़ने वाले हाथ अब कलम चला रहे हैं। चमड़ा निकोलकर उसकी पनही (जूते) बनाने वाले लोग पूरे मुल्क के लिए नीतियां गढ़ रहे हैं। वो जमाना और था जब गांव के बाबू साहब बेबात इन पर लात-घूंसे बरसा देते थे। मुझे भी सुखद लगता है ये सब। वाकई बापू की अवधारणा वाली असली आज़ादी तो अब मिली है हमारे देश को। मैं खुद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की कार्यशैली का प्रशंसक हूं। कुछ दिन पहले लॉ एंड आर्डर के लिए पुलिस के आला अफसरों की मीटिंग में वजीरे-आला ने सख्त हिदायत दी कि प्रदेश में जहां-कहीं भी दलित उत्पीड़न की घटना हो, डीआईजी खुद मौके का मुआइना करेंगे। फरमान काबिले तारीफ है, मगर इसका दूसरा पहलू बेहद काला दिख रहा है। कड़क मिजाज बहनजी के फरमान से अफसरान इतने खौफजदा हैं कि उनके हुक्म को लकीर की मानिंद पीट रहे हैं। बहनजी को इस बात पर कान देना होगा। उत्तर प्रदेश के ही रायबरेली की एक घटना का यहां जिक्र करना चाहूंगा। इस जिले के एक गांव में दलित बिरादरी के दो लड़कों ने गांव के एक सवर्ण के घर में चोरी की। दोनों पहले से ही चोरी के लिए बदनाम थे। शक होने पर उनके घर की तलाशी ली गई तो चोरी का सामान वहां से बरामद हुआ। गुस्सा स्वाभाविक था। इन दोनों लड़कों के साथ गांव के लोगों ने वही सुलूक किया, जो अमूमन पकड़े जाने पर चोर-उचक्कों के साथ होता है। पुलिस को भी ख़बर लगी, मगर ये क्या पुलिस को इस घटना में नज़र आया तो सिर्फ दलित उत्पीड़न। जिनके घर चोरी हुई थी, पुलिस ने उल्टे उन्हें ही परिवार के साथ हवालात में डाल दिया। इतना काफी नहीं था शायद। इन पर गैगस्टर एक्ट भी लगा दिया गया। पुलिस को तो बहनजी के डंडे का खौफ था। चोरी में पकड़े गए दलित युवकों को मुआवजा भी दिलाया गया और उनकी हिफाजत के लिए पुलिस को मुस्तैद कर दिया गया। क्या ये जायज है? मुख्यमंत्री जी, आपसे गुजारिश है कि इस पहलू पर भी गौर करें, नहीं तो क्या होगा हमारे सामाजिक ताने-बाने का?
Thursday, May 28, 2009
...मत बनाओ मेरे गाँव को दिल्ली
बाहर निकालो! मुझे
पत्थरों के इस बियाबान से,
उफ़! कितनी घुटन है, टूटन है, ऊबन है
कितनी रेतीली है, पांव के नीचे की धरती
पानी की सोत तलाशते बेदम हूँ मैं
कनाट प्लेस के गंधहीन वोगेनबेलिया से
कहीं ज़्यादा खूबसूरत हैं, मेरे गाँव के दक्खिन में खिले
बेहया के फूल
हाँ, मुझे प्यार है, अपने तालाब की जलकुम्भी से
कीचड़ की सोंधी महक से
मत बनाओ मेरे गाँव को दिल्ली.
पत्थरों के इस बियाबान से,
उफ़! कितनी घुटन है, टूटन है, ऊबन है
कितनी रेतीली है, पांव के नीचे की धरती
पानी की सोत तलाशते बेदम हूँ मैं
कनाट प्लेस के गंधहीन वोगेनबेलिया से
कहीं ज़्यादा खूबसूरत हैं, मेरे गाँव के दक्खिन में खिले
बेहया के फूल
हाँ, मुझे प्यार है, अपने तालाब की जलकुम्भी से
कीचड़ की सोंधी महक से
मत बनाओ मेरे गाँव को दिल्ली.
Sunday, February 8, 2009
मेरा झिलमिल प्यार....

पावस की पहली फुहार जेठ-बैसाख का ताप सह चुकी मिट्टी पर पड़ी, फिर सोंधी सी महक छिटक उठी। सरसों के हरे-भरे खेत, पीली पंखु्ड़ियों ने जैसे आंखें खोलीं, एक मादक सी गंध बिखर गई चारों ओर। नहर से निकली माइनर, माइनर और नहर के बीच सेतु बना कुलाबा। कुलाबा जब नहरी पानी के प्रवाह को थामकर माइनर में फेंकता तो आवाज आती...कैसी आवाज? झरने सी। पानी पूरे खेत में फैलता, बगुलों का झुंड टूट पड़ता। ये मेरे छुटपने का प्यार हैं। एक तरफा नहीं, मुझे लगता ये सब मेरे लिए ही हैं। बेशक अब ये प्रेम कहानी विरह के अंजाम पर है। प्रेम को सिद्धांतो, परिभाषाओं में कैसे जकड़ सकते हैं? जितना सरल, सरस और सहज है प्रेम..शायद उतना जटिल भी। महसूसा जा सकता है, मगर कहा नहीं जा सकता। अभिव्यक्त किया नहीं जाता, हो जाता है। कोई खास मौका नहीं हो सकता, प्रीत को जाहिर करने का। बल्कि जब जाहिर होने लगता है तो मौका खास बन जाता है। आकर्षण पहला बिंदु है प्रेम का॥इस बिंदु से बिंदु जुड़ते जाते हैं..जुड़ते जाते हैं तो खिंच जाती है प्यार की सरल रेखा। ये रेखा पहले हल्की गुलाबी फिर चटख सुर्ख हो जाती है और फिर रेशम की डोर बन गुंथ जाती है, मन को बांध लेती है। इस बंधन में गुदगुदी होती है़। डोर कहीं से भी कमजोर पड़ती है तो असहनीय चुभन होती है, ये चुभन भी खुशनसीबों को ही मयस्सर होती है। प्यार में टूटकर बिखरना, टुकड़ों-टुकड़ों में जुड़ते रहना भी एक हुनर है। ये हुनर हासिल करना ही शायद प्यार की शर्त है...और तो कोई शर्त नहीं होती प्यार की।
शायर रौनक रजा के अल्फाज़ में...
हमने तुमने बचपन में अपनी-अपनी खिड़की से
आइनों की किरणों से, कितने खेल खेले हैं,
अब जवान होते ही क्या हुआ?
खिड़कियां नहीं खुलतीं, आइने अकेले हैं।
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बिछड़के तुमसे वो आलम मेरी उड़ान का था..
कि मैं जमीं का रहा न आसमां का।
पत्रकार आलोक श्रीवास्तव के शब्दों में........
मै तुम्हें प्रेम करना चाहता था
जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा
तुम्हारे भाई, पिता मां और भी तुम्हारे चारों तरफ के तमाम लोग
जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके
मैंने चाहा था तुम्हें उस तरह से चाहना
चांद सितारों की तिरछी पड़ती रोशनी में
दिप-दिप हुआ तुम्हारा चेहरा
बहुत करीब से देखना
मैं चाहता था
तुम्हारा बचपन खुद जीना तुम्हारे साथ
तुम्हारे अतीत की गलियों -मोहल्लों शहरों में जाना
जिस नदी के जिस किनारे कभी तुम ठहरी हो कुछ पल को
अपनी हथेलियों में वहां उस नदी को उठा लेना
जो फूल तुम्हें सबसे प्रिय रहे कभी एक-एक पखुंड़ी को
हाथ में लेकर देर तक सहलाना
तुम्हारे इसी नगर में मैं इन सबक साथ थके कदमों से गुजरता हूं
कभी तुम्होर घर के सामने से
कभी बहुत दूर उन रास्तों से
उन लोगों से, उन इमारतों और उन दरख्तों से
जो तुमसे आशना था
पर ये दर्द है कि बढ़ता ही जाता है।।
Monday, December 29, 2008
साल नया, पुरानी इबारत
लो, फिर आ गया नया साल
मेरे कैलेंडर की इबारत बदलने
०१ जनवरी से ३१ दिसंबर तक
एक-एक दिन विहान किए मैंने
नए साल के इंतजार में..
अब आने को है नया साल
बीबी कल ही ले आईं नया गणेशआपा
पहले उनने त्यौहारों की तारीखें देखीं
फिर उलटा सालाना राशिफल का पन्ना
रोजगार की दिशा में किया प्रयास सार्थक होगा
साल के मध्य में सुधरेगी राहु की महादशा
उनकी आंखें चमकीं, उनींदेपन से मुझे झिंझोड़ा
मैंने, उबासियां लीं, 'सुजाता' का चेहरा हाथों में थामा
कितनी आशावादी हो तुम..मैंने कहा..
३१ दिसंबर २००७ का संवाद मत दोहराओ।
हां, मेरी शर्ट सफेद करती रहो रोज..
मैं रंग भरूंगा तुम्हारे सपनों में एक रोज
अपनी नींदें कर दी हैं नीलाम, ज़मीर गिरवी
चूल्हा गरम करने को, तुम्हारी साड़ी में पैबंद लगाने को।
मेरे कैलेंडर की इबारत बदलने
०१ जनवरी से ३१ दिसंबर तक
एक-एक दिन विहान किए मैंने
नए साल के इंतजार में..
अब आने को है नया साल
बीबी कल ही ले आईं नया गणेशआपा
पहले उनने त्यौहारों की तारीखें देखीं
फिर उलटा सालाना राशिफल का पन्ना
रोजगार की दिशा में किया प्रयास सार्थक होगा
साल के मध्य में सुधरेगी राहु की महादशा
उनकी आंखें चमकीं, उनींदेपन से मुझे झिंझोड़ा
मैंने, उबासियां लीं, 'सुजाता' का चेहरा हाथों में थामा
कितनी आशावादी हो तुम..मैंने कहा..
३१ दिसंबर २००७ का संवाद मत दोहराओ।
हां, मेरी शर्ट सफेद करती रहो रोज..
मैं रंग भरूंगा तुम्हारे सपनों में एक रोज
अपनी नींदें कर दी हैं नीलाम, ज़मीर गिरवी
चूल्हा गरम करने को, तुम्हारी साड़ी में पैबंद लगाने को।
Tuesday, November 11, 2008
Wednesday, August 27, 2008
कुछ नई लड़कियां.....
अबे ओए...इधर आ॥तू साले ना ऐसे नहीं सुधरेगा..इतना कहकर उस लड़की ने अपने हम उम्र लड़के को पीछे से एक किक जमाई। मैं तो ताकता ही रह गया॥टुकुर..टुकुर। लोवर हाफ़ में घुटने के थोड़ा नीचे तक चुस्त जींस॥ऊपर बनियाननुमा टीशर्ट डाले हुए थी वह लड़की। टीवी की पत्रकार है वह..उसके जैसी कई लड़कियां हैं। जो घर से दफ्तर के लिए निकलती हैं तो शर्म हया, लाज-लिहाज सब आल्मारी में बंद कर आती हैं। मेरे लिए ये थोड़ा नया और अटपटा भी था। ये तो सुना था कि थोड़ी बोल्ड होती हैं ये। मगर, इतनी ज़्यादा ये नहीं सोचा था। बेचारी हैं...करें तो क्या करें॥घर की चौखट लांघी नहीं कि अनगिनत निगाहें गड़ जाती हैं उन पर..समझती खूब हैं..पर ये समझने देती हैं कि वो कुछ समझ नहीं रही हैं। अब पर्दे में छिपी-दबी सकुचाई सी रहने वाली नहीं..मेरी दादी अम्मा बताती थीं कि उन्होंने पहली दफा जब दादाजी का चेहरा ठीक से देखा था तब तक उनकी तीन संतानें पैदा हो चुकी थीं,,मैंने थो़ड़ी ठिठोली भी की थी उनसे कि दादा जी का चेहरा देखे बगैर आप मां बनीं कैसे..उन्होंने आंखें तरेंरीं और कुछ बताया..जिसका आशय था कि अंधेरा भी लाज-लिहाज का परदा होता था। मगर दादी का ज़माना तो कब का लद गया भाई। महिलाएं पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर नहीं, बलि्क उनसे एक दो कदम आगे बढ़कर चल रही हैं। मुझे इस पर आपत्ति नहीं है..आपत्ति है तो बस उनके टर्न आउट (पहनावे) पर। उनके साथ अभद्रता होती है..रेप जैसी वारदातें भी कम नहीं हो पा रही हैं। कहीं न कहीं विकृति कायम है। इसे उभरने न दें। बच्चियों आगे बढ़ो..लड़ो..चढ़ो..टकराओ,,लेकिन संभल..संभलकर पांव रखो..अभी गली-गली में शैतान घूम रहे हैं मुखौटे लगाए........
Sunday, July 27, 2008
हाई अलर्ट....बी अलर्ट, वी अलर्ट!
कितने बेबस हो गए हैं हम। रौ में चल रहा जनजीवन जाने कब तबाही के मंजर में तब्दील हो जाए। हंसी-ठिठोली, ठहाके और जिजीविषा का शोर कब तरमीम हो जाए चीत्कार और हा-हाकार में। कहीं से खबर न आए जाए अपनों के मारे जाने की। अब आदत सी तो नहीं बन जा रही है हमें ऐसे माहौल में घुट-घुटकर और टूट-टूटकर जीने की। बेंगलुरू के बाद शनिवार को अहमदाबाद में दहशतगर्दों की कायराना हरकत ने फिर हमें झिझोंड़ डाला। हम मुंह मोड़ ले रहे हैं। सिर्फ इतना भर पता करके संतोष कर ले रहे हैं कि धमाकों की जद में कहीं हमारा कोई लगा-सगा तो नहीं आ गया। कैसी विपदा में फंसे हैं हमारे भारत के अमनपसंद लोग। हमारी साझी विरासत को कैसे तार-तार कर रहे हैं सिरफिरे। राजधानी समेत देश के तमाम बड़े शहरों में हाई अलर्ट है। सिक्योरिटी सिस्टम मुस्तैद है। हमें भी मुस्तैदी दिखानी होगी। हमारे बीच ही छिपे हैं मासूमों के कातिल नमक हराम। स्लीपर सेल को जमींदोज करने को हमें जागना होगा। ये खबर का विषय नहीं है। मीडिया जगत और सरकारी प्रचार तंत्र से भी गुजारिश है कि कैसे हुए धमाके....इन खबरों के बजाए हमें रोज-ब-रोज याद दिलाएं कि कोई चुटकी भर बारूद रखकर हमारी तबाही का खेल-खेलने की साजिश तो नहीं रच रहा। वरना हमारे चीथड़े यूं ही उड़ते रहेंगे।
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