सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

अब मैं एक स्त्री हूं...

वो पूनम का चांद नहीं था? जिससे चांद को तराशा गया है वह एक अनगढ़ सी
सुनहली मिट्टी का टुकड़ा भर था। अभी इसका कोई आकार नहीं था। फिर भी कशिश
इतनी कि जी करता था निहारता रहूं बस। एकटक, पलकें झपकाए बिना। चांदनी में
घुला हल्का अंधेरा हो, बस इतनी ही उजास हो उसमें कि मुखड़ा तुम्हारा
दिखता रहे। तुम मुझे न देख पाओ। मैं नहीं चाहता तुम मुझे देख सको। तुम बस
आसमान की ओर ताकती रहो..देखो किस तारे पर तुम्हारा नाम लिखा है? मगर तुम
ये नीचे की रेतीली धरती पर क्या तलाशती फिर रही हो? समझ नहीं आ रहा।...
मुझे ले चलो...। कांपते होठों से उसकी लरजती हुई आवाज निकली। अंधेरे पाख
में अभी पूरे पंद्रह रोज बाकी हैं, तुम ले चलो बस। जल्दी करो..। अभी
बादलों की ओट है। अभी मेरा अभ्युदय बाकी है। पूरणमासी आते-आते मैं जब
पूरा चांद हो जाऊंगी तब मेरी डोली उठेगी और तब तुम मुझे देख नहीं पाओगे।
ओझल हो जाऊंगी मैं तुम्हारी आंखों के आगे से। तब तुम अभिनय करोगे खुश
होने का। तुम रो नहीं सकते खुलकर,,,। तुम मुझे रोक भी न सकोगे। .क्यों?
क्योंकि तुम मेरे पिता नहीं हो। भाई होते तब भी विदा की घड़ी में तुम
आखिरी बार मेरी पलकों के नीचे अपनी अंगुलियां फिराकर मेरे आंसू सुखा सकते
थे।
तो तुम चलो, एक छोटी पगडंडी पकड़ते हैं। बस, इसे पकड़कर सीधी चलती रहना,
देखना पैर डगमग न हों, अगल-बगल गहरी खाईं है। गहरी खाई है??? तो क्या तुम
मुझे गिरने दोगे? तुम भी न बावरी हो। मैं खुद को संभालूंगा कि तुम्हें।
अब छोड़ो भी बस ले चलो। उसने जिद नहीं छोड़ी। चलती चली गई...उसके पैर के
तलुवे जमीन पर पूरे चिपक रहे थे। उसके एक कदम पड़ते तो फिर वह बादलों की
ओर देखती..लंबी सांस छोड़ती..। उसने मेरा कंधा पकड़कर झकझोरा।
सुनो...सूरज को रोक दो..। कह दो इतना उतावला न बने। क्यूं अब सूरज से
तुम्हारी क्या रुसवाई? है रुसवाई। ये आएगा तो अंधेरा छंट जाएगा और जब
अंधेरा छंट जाएगा तो तुम मुझे देख नहीं पाओगे। फिर मैं अपने देस चली
जाऊंगी। फिर तुम मुझे कहां ढूंढते भटकोगे? व्यर्थ होगा, तुम मुझसे फिर
कभी नहीं मिल सकोगे। फिर उसने मेरे कंधे पर अपना सिऱ टिकाया। आंखे
मूंदी., आंखों से खारे पानी की धारा बहाती सपनों में खो गई।
सुनो कोई गीत गुनगुनाओ...। कोई भ्रमर गीत। फिर वह गीत सुनती रही। ये गीत
मन मंदिर में गूंजते रहेंगे। तब लगेगा कोई दूर रहकर भी कितना करीब है।
अब घने बादल साथ छोड़ रहे हैं। रुई के फाहे की मानिंद,,अब तुम्हारा चेहरा
कुछ-कुछ दिखने लगा है। जब ये सबको दिखने लगेगा तब ये मुझे नहीं दिखेगा।
उसने आंखें भींचते हुए बादलों की ओर देखा। तुमने सूरज को रोका क्यों
नहीं। अब जब मेरा चेहरा सबको दिखेगा तो मुझे जाना ही होगा। तुम आना.. जब
शहनाई के शोरगुल के बीच लोग मेरा पीहर छु़ड़ा देंगे। तब मैं स्त्री जैसी
दिखूंगी। जिसकी कोख से मैं जन्मी, शगुन की दही-चीनी खिलाकर वह मुझे जाने
किसे सौंप देगी। मैं जानती हूं वह मेरी मां है, पर वह भी एक स्त्री है।
उसका कलेजा छलनी हो रहा होगा पर वो गीत गाएगी और आंचल में मुंह छिपाकर
रोएगी। बाबा...जिनने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उनके सिऱ का बोझ उतर गया।
कागज के कई बंडल जिन पर मुद्रा होने की पहचान छपी थी। बाबा ने उन अनजाने
लोगों को सौंप दिया था और कहा था बेटी बड़े दुलार से पली है..ये कुछ पैसे
हैं..बेटी के जन्मने का जुर्माना। कोई गलती हो गई होगी खातिरदारी में तो
माफी।

अब शहनाई का शोरगुल तारी था। ये क्या हो रहा है? ये कैसी महफिल सजी है?
लोग-बाग दावतों में मसरूफ हैं। कोई कुछ सुन क्यूं नहीं रहा। कहां है मेरी
नन्हीं परी? वो है... ना..ना नहीं। वो नहीं है। चलो अभी खुद देखेगी तो
भागती आएगी। अरे वो कौन है जिसे परंपराओं के बंधन में राजी खुशी बांधा जा
रहा है? यही है पूनम का चांद। उफ, ये किसने अजीब से रंग इस चांद के
मुखड़े पर फैला दिए हैं। कहां है वह धुला-धुला दमकता मुखड़ा। मैं गौर से
देखता रहा। कुछ रेखाएं उभर आई थीं. उस पूनम के चांद के ऊपर। ये रेखाएं
मेरी जानी हुई थीं। अक्स कुछ-कुछ धुंधलाया सा नजर आ रहा था। मैंने आवाज
दी। आवाज जाने कहां लोप हो गई? अब तुम नजरें क्यों नहीं उठा रही हो?
अंधेरा छंट गया। तुम्हारी लरजती आवाज कानों में गूंज रही है...सूरज को
रोको नहीं तो तुम मुझे नहीं देख पाओगे। उन लोगों को भी नहीं जो मुझे ले
जाएंगे। फिर तुम रो भी नहीं सकोगे खुलकर..क्यूं..क्योंकि न तुम मेरे पिता
हो न भाई। बहन और मां भी नहीं। तुम मेरे लिए पवित्र हो, पर दुनिया तुम्हे
अछूत और अपवित्र मानेगी। अब मैं एक स्त्री हूं और किसी स्त्री को छूना
पाप है।
पवन तिवारी

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

एक साथी की चिट्ठी...

कुछ पुराने पत्रजात खोज रहा था, तभी एक लिफाफा हाथ लग गया। मेरे चंडीगढ़ वाले पते पर भाई पंकज मिश्र ने बरेली से ये चिट्ठी भेजी थी। चिट्ठी पर तारीख है छह दिसंबर २००६ की। आज २ दिसंबर २०११ है। पांच एक साल गुजर गए। लिखा हुआ स्थायी रहता है। शब्दों की ये अपनी गरिमा है..उन पर वक्त की धूल जम जाती है,,पर मिटते कहां हैं ये अल्फाज। आप भी बांचिए हमारे सखा की चिठिया...
प्यारे फैजाबादी,
आज तुम्हारी याद बड़े गहरे से होकर गुजरी, बस चिट्ठी लिखने बैठ गया। एक कहानी पढ़ रहा था-बलि। हंस के अगस्त २००६ के अंक में छपी स्वयंप्रकाश की कहानी, जिसमें एक लड़की है, अपने रीति-रिवाजों- जगहों से प्यार करने वाली, लेकिन बाजार और विकास की जुगलबंदी उसे जिस तरह खत्म करती है, वह बड़ा तकलीफदेह है। खैर..कहानी की छाया प्रति तुम्हारे लिए नत्थी कर दी है।
इधर, फोन पर तुमसे लंबी-लंबी बातें हुईं,लगा कि तुम अभी चंडीगढ़िया नहीं हुए, फैजाबादी ही हो और रहोगे। उमराव जान अदा और गजल साम्राग्यी बेगम अख्तर के शहर के। आचार्य नरेंद्रदेव और राम मनोहर लोहिया की जमीन के। उस अवध के हो जहां, कभी मानस के कई कांड तुलसीदास ने रचे। तुम मसोढ़ा वाले कवि शलभ श्रीराम के पड़ोसी हो। अरे तुम तो पूरे अवधिया हो भाई। लगता भी है जब भावुकता में फक्क से रो पड़ते हो और मुशि्कल में सीना तानकर खड़े हो जाते हो।
पुरवाई चलती है तो बड़ा अच्छा लगता है। इसमें अवध की मिठास भी बही चली आती है, इसमे शाहजहांपुर भी घुला-मिला रहता है। मैं यहां कंक्रीट के ऐसे जंगल में हूं, जहां हवाएं भी बड़ी बेरहम हो जाती हैं। मित्र बड़ा निष्ठुर समय है यह। यहां कोई भी अर्थ खोजना व्यर्थ है। धूमिल के शब्दों में---नहीं वहां अब कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है। पेशेवर भाषा के तस्कर संकेतों और बैलमुती इमारतों में कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है, हो सके तो बगल से गुजरते आदमी से कहो---लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा, यह जुलूस के पीछे गिर गया था। तो ऐसे मुखौटों में चेहरों की पहचान कहां? एक अजनबीयत पसरी है चारों ओर। हां, कुछ चीजें तुम्हारे पास हैं जो तुम बरेली के पड़ाव में छोड़ गए थे। जब अंधेरा घना होता है तो इन्हीं के सहारे रोशनी तलाश लेता हूं। अब लोग क्या समझेंगे इन चीजों के मायने। जगहों से प्यार करने का रिवाज तो कब का खत्म हो चुका है और यादों को जिंदा रखने का भी।
स्वस्थ, मस्त, व्यस्त होगे, आभास।
भाई ही
पंकज मिश्र

शनिवार, 19 मार्च 2011

खबर

१५ अगस्त २००९. तब से अब तकरीबन डेढ़ बरस बीत चुके हैं। बस वही विदाई वाली पोस्ट पड़ी है। कुछ गोंदागादी नहीं हो पाई। इस दरम्यान पंकज भाई ने झाड़पोंछकर अपना ब्लॉग चमका लिया है। इस होली हम फिर सिलसिला शुरू करते हैं। अब चलता रहे हे होलिका माई। बोल कबीरा सारारारारा...

शनिवार, 15 अगस्त 2009

बैकग्राउंडर

नई दिल्ली हाउस की लिफ्ट नीचे की ओर सरक रही थी और कलेजा ऊपर की ओर। एचआर वाली मैडम को इस्तीफा दे आया था। नई नौकरी का जुगाड़ पहले ही हो गया था। साल भर हिचकोले खाता रहा, टीवी में। नए-नए काम खूब सीखा। खुद को निचुड़ने से रोकने की कभी कोशिश तक नहीं की। छापेखाने से कुछ ज्यादा ही मोह-ममता हो गई थी या फिर नए ट्रैक पर रफ्तार नहीं बना पा रहा था, कुछ साफ नहीं है। वैसे भी मैं कौन सा बहुत बड़ा विचारक हूं कि हर कदम तर्कपूर्ण ही उठाऊं। जिंदगी का हर सफर कुछ न कुछ सीख देता है। ये सफर भी बड़ा ही रोमांचक रहा। कुछ यादों पर वक्त की धूल की परतें चढ़ गईं हैं, उन्हें झाड़ रहा हूं। किसी को अच्छा लगा तो अच्छा, बुरा लगे तो भइया माफी देना, दुनिया गोल है।पहला दिन था, चैनल की नौकरी का। ईपी साहब न्यूज़ रूम में सबसे मिलाने ले गए, ये हैं फलां जी, हमारे अमुक विभाग के हेड,,,मुझे पता नहीं कहां से सुनाई पड़ा,,,ऑरक्युट हेड... संयोग से उनने वही खोल भी रखा था। मैंने सोचा ये कौन सा पद है? अच्छा..ऑरक्युट के जरिए लाइन-अप करते होंगे रिपोर्टरों को या फिर कंटेंट प्रोवाइडर्स को...मैंने अपना ग्यान लगाया। हालांकि बाद में उनका पद जान पाया तो खुद पर बड़ी हंसी आई। फिर आगे बढ़े सबसे मिलाते गए ईपी सर। मुझे रनडाउन डेस्क, जहां खबरों को चलाने का क्रम और हेडलाइन बनती है, पर बैठकर कामकाज सीखने को कहकर चले गए वे। मैं पीछे एक बेंच पर बैठ गया। एक मोहतरमा थीं, होंठ पर हल्की लिप्सिटक और चेहरे पर उससे कई गुना कॉन्फिडेंस पोते हुए। कंप्यूटर पर कुछ टाइप कर रही थीं, पलटीं और बोली हुं,,वहां क्या कर हो? ऐसे कैसे सीखोगे? मेरा मुंह उस वक्त देखने लायक रहा होगाहोगा। बोली-इधर आओ। कहां थे इससे पहले? मैंने बोला, जी अखबार में।,,,ऐं,,अखबार में,,अच्छा देखो ये टीवी है? लैंगुवेज जरा ठीक रखना। एसटीडी पैकेज क्या है? एसटीडी वीओ शॉट,,सॉट ,,,शॉट सॉट? मैं क्या हेडिंग, सब हेडिंग, क्रासर, फ्लैग, इंट्रो, ७२ प्वाइंट हेडिंग, लीड-बॉटम, फिलर वाला बंदा ये सब क्या जानूं। मैंने ना में सिर हिलाया बोला। हफ्ते भर में जान लूंगा मैडम जी। बस क्या था बगल में बैठे एक बड़े बॉस मुंह की गिलौरी संभालते हुए चीख पडे...अट्ठारह साल में मैं नहीं सीख पाया टीवी और ये हफ्ते भर में सीख लेंगे। मैं समझ गया॥ये बड़ी चीज हैं। वे वाकई बड़ी चीज हैं। बड़े-बड़े संपादकों को बूशट खरीद कर दिलवाई है उनने।

खैर, मैं शांत भाव सबको देखता-समझता रहा। मुझे क्या करना है? ये जल्दी सीखने की कोशिश करने लगा। जितना बेवकूफ हूं, उससे ज्यादा अपने को शो करता रहा। जो लोग संजीदा थे वो ताड़ गए थे मुझे। नई-नई दोस्ती हुई। सबसे दोस्ती हुई। कभी कभी रात १० बजे का दफ्तर पहुंचा सुबह १० बजे छूटा। एक बार नाइट शिफ्ट के बाद जब अगले दिन सुबह साढ़े दस तक रिलीव नहीं हुआ तो एक बॉस को फोन किया। उनकी प्रतिक्रिया थी..तिवारी को तो सुबह से ही खुजली होने लगती है? हालांकि बाद में उन्हें बड़ी खुजली हुई और उन्हें विदा होना पड़ा। ये सब मुझे नहीं लिखना चाहिए। मेरे बारे में कंपनी की क्या फीड बैक है? मुझे नहीं पता। कोशिश रही कि कोई उंगली न उठाने पाए। मेरे जाने के बाद भी कोई उंगली न उठाए। यही मेरा कैरेक्टर रोल होगा। कुछ बड़े मेहनती लोग हैं, बेहद सकारात्मक नजरिया है उनका। मेरा नर्सरी स्कूल ये टीवी फलता-फूलता रहे। अब नई पारी शुरू की है। हे ईश्वर अब, कहीं नौकरी के लिए मत भटकाना मुझे। सीवी अपडेट करते-करते थक चुका हूं, टेस्ट और इंटरव्यू देते भी। रिलीविंग लेटर और ज्वाइनिंग लेटर लेते भी। कोई कह देगा कि नौकरी तलाश लो कहीं, तो तलाशूंगा। नहीं तो तराशता रहूंगा खुद को। आखिर कितने टुकड़े करूंगा मन के।

गुरुवार, 28 मई 2009

...मत बनाओ मेरे गाँव को दिल्ली

बाहर निकालो! मुझे
पत्थरों के इस बियाबान से,
उफ़! कितनी घुटन है, टूटन है, ऊबन है
कितनी रेतीली है, पांव के नीचे की धरती
पानी की सोत तलाशते बेदम हूँ मैं
कनाट प्लेस के गंधहीन वोगेनबेलिया से
कहीं ज़्यादा खूबसूरत हैं, मेरे गाँव के दक्खिन में खिले
बेहया के फूल
हाँ, मुझे प्यार है, अपने तालाब की जलकुम्भी से
कीचड़ की सोंधी महक से
मत बनाओ मेरे गाँव को दिल्ली.

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

मेरा झिलमिल प्यार....


पावस की पहली फुहार जेठ-बैसाख का ताप सह चुकी मिट्टी पर पड़ी, फिर सोंधी सी महक छिटक उठी। सरसों के हरे-भरे खेत, पीली पंखु्ड़ियों ने जैसे आंखें खोलीं, एक मादक सी गंध बिखर गई चारों ओर। नहर से निकली माइनर, माइनर और नहर के बीच सेतु बना कुलाबा। कुलाबा जब नहरी पानी के प्रवाह को थामकर माइनर में फेंकता तो आवाज आती...कैसी आवाज? झरने सी। पानी पूरे खेत में फैलता, बगुलों का झुंड टूट पड़ता। ये मेरे छुटपने का प्यार हैं। एक तरफा नहीं, मुझे लगता ये सब मेरे लिए ही हैं। बेशक अब ये प्रेम कहानी विरह के अंजाम पर है। प्रेम को सिद्धांतो, परिभाषाओं में कैसे जकड़ सकते हैं? जितना सरल, सरस और सहज है प्रेम..शायद उतना जटिल भी। महसूसा जा सकता है, मगर कहा नहीं जा सकता। अभिव्यक्त किया नहीं जाता, हो जाता है। कोई खास मौका नहीं हो सकता, प्रीत को जाहिर करने का। बल्कि जब जाहिर होने लगता है तो मौका खास बन जाता है। आकर्षण पहला बिंदु है प्रेम का॥इस बिंदु से बिंदु जुड़ते जाते हैं..जुड़ते जाते हैं तो खिंच जाती है प्यार की सरल रेखा। ये रेखा पहले हल्की गुलाबी फिर चटख सुर्ख हो जाती है और फिर रेशम की डोर बन गुंथ जाती है, मन को बांध लेती है। इस बंधन में गुदगुदी होती है़। डोर कहीं से भी कमजोर पड़ती है तो असहनीय चुभन होती है, ये चुभन भी खुशनसीबों को ही मयस्सर होती है। प्यार में टूटकर बिखरना, टुकड़ों-टुकड़ों में जुड़ते रहना भी एक हुनर है। ये हुनर हासिल करना ही शायद प्यार की शर्त है...और तो कोई शर्त नहीं होती प्यार की।
शायर रौनक रजा के अल्फाज़ में...
हमने तुमने बचपन में अपनी-अपनी खिड़की से
आइनों की किरणों से, कितने खेल खेले हैं,
अब जवान होते ही क्या हुआ?
खिड़कियां नहीं खुलतीं, आइने अकेले हैं।
------------------------------------------------
बिछड़के तुमसे वो आलम मेरी उड़ान का था..
कि मैं जमीं का रहा न आसमां का।

पत्रकार आलोक श्रीवास्तव के शब्दों में........

मै तुम्हें प्रेम करना चाहता था
जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा
तुम्हारे भाई, पिता मां और भी तुम्हारे चारों तरफ के तमाम लोग
जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके
मैंने चाहा था तुम्हें उस तरह से चाहना
चांद सितारों की तिरछी पड़ती रोशनी में
दिप-दिप हुआ तुम्हारा चेहरा
बहुत करीब से देखना
मैं चाहता था
तुम्हारा बचपन खुद जीना तुम्हारे साथ
तुम्हारे अतीत की गलियों -मोहल्लों शहरों में जाना
जिस नदी के जिस किनारे कभी तुम ठहरी हो कुछ पल को
अपनी हथेलियों में वहां उस नदी को उठा लेना
जो फूल तुम्हें सबसे प्रिय रहे कभी एक-एक पखुंड़ी को
हाथ में लेकर देर तक सहलाना
तुम्हारे इसी नगर में मैं इन सबक साथ थके कदमों से गुजरता हूं
कभी तुम्होर घर के सामने से
कभी बहुत दूर उन रास्तों से
उन लोगों से, उन इमारतों और उन दरख्तों से
जो तुमसे आशना था
पर ये दर्द है कि बढ़ता ही जाता है।।

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

साल नया, पुरानी इबारत

लो, फिर आ गया नया साल
मेरे कैलेंडर की इबारत बदलने
०१ जनवरी से ३१ दिसंबर तक
एक-एक दिन विहान किए मैंने
नए साल के इंतजार में..
अब आने को है नया साल
बीबी कल ही ले आईं नया गणेशआपा
पहले उनने त्यौहारों की तारीखें देखीं
फिर उलटा सालाना राशिफल का पन्ना
रोजगार की दिशा में किया प्रयास सार्थक होगा
साल के मध्य में सुधरेगी राहु की महादशा
उनकी आंखें चमकीं, उनींदेपन से मुझे झिंझोड़ा
मैंने, उबासियां लीं, 'सुजाता' का चेहरा हाथों में थामा
कितनी आशावादी हो तुम..मैंने कहा..
३१ दिसंबर २००७ का संवाद मत दोहराओ।
हां, मेरी शर्ट सफेद करती रहो रोज..
मैं रंग भरूंगा तुम्हारे सपनों में एक रोज
अपनी नींदें कर दी हैं नीलाम, ज़मीर गिरवी
चूल्हा गरम करने को, तुम्हारी साड़ी में पैबंद लगाने को।

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

स्मृति शेष ......

परम आदरणीय बाबू लाल शर्मा जी को श्रद्धा के दो पुष्प मेरी ओर से भी....

बुधवार, 27 अगस्त 2008

कुछ नई लड़कियां.....

अबे ओए...इधर आ॥तू साले ना ऐसे नहीं सुधरेगा..इतना कहकर उस लड़की ने अपने हम उम्र लड़के को पीछे से एक किक जमाई। मैं तो ताकता ही रह गया॥टुकुर..टुकुर। लोवर हाफ़ में घुटने के थोड़ा नीचे तक चुस्त जींस॥ऊपर बनियाननुमा टीशर्ट डाले हुए थी वह लड़की। टीवी की पत्रकार है वह..उसके जैसी कई लड़कियां हैं। जो घर से दफ्तर के लिए निकलती हैं तो शर्म हया, लाज-लिहाज सब आल्मारी में बंद कर आती हैं। मेरे लिए ये थोड़ा नया और अटपटा भी था। ये तो सुना था कि थोड़ी बोल्ड होती हैं ये। मगर, इतनी ज़्यादा ये नहीं सोचा था। बेचारी हैं...करें तो क्या करें॥घर की चौखट लांघी नहीं कि अनगिनत निगाहें गड़ जाती हैं उन पर..समझती खूब हैं..पर ये समझने देती हैं कि वो कुछ समझ नहीं रही हैं। अब पर्दे में छिपी-दबी सकुचाई सी रहने वाली नहीं..मेरी दादी अम्मा बताती थीं कि उन्होंने पहली दफा जब दादाजी का चेहरा ठीक से देखा था तब तक उनकी तीन संतानें पैदा हो चुकी थीं,,मैंने थो़ड़ी ठिठोली भी की थी उनसे कि दादा जी का चेहरा देखे बगैर आप मां बनीं कैसे..उन्होंने आंखें तरेंरीं और कुछ बताया..जिसका आशय था कि अंधेरा भी लाज-लिहाज का परदा होता था। मगर दादी का ज़माना तो कब का लद गया भाई। महिलाएं पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर नहीं, बलि्क उनसे एक दो कदम आगे बढ़कर चल रही हैं। मुझे इस पर आपत्ति नहीं है..आपत्ति है तो बस उनके टर्न आउट (पहनावे) पर। उनके साथ अभद्रता होती है..रेप जैसी वारदातें भी कम नहीं हो पा रही हैं। कहीं न कहीं विकृति कायम है। इसे उभरने न दें। बच्चियों आगे बढ़ो..लड़ो..चढ़ो..टकराओ,,लेकिन संभल..संभलकर पांव रखो..अभी गली-गली में शैतान घूम रहे हैं मुखौटे लगाए........

रविवार, 27 जुलाई 2008

हाई अलर्ट....बी अलर्ट, वी अलर्ट!

कितने बेबस हो गए हैं हम। रौ में चल रहा जनजीवन जाने कब तबाही के मंजर में तब्दील हो जाए। हंसी-ठिठोली, ठहाके और जिजीविषा का शोर कब तरमीम हो जाए चीत्कार और हा-हाकार में। कहीं से खबर न आए जाए अपनों के मारे जाने की। अब आदत सी तो नहीं बन जा रही है हमें ऐसे माहौल में घुट-घुटकर और टूट-टूटकर जीने की। बेंगलुरू के बाद शनिवार को अहमदाबाद में दहशतगर्दों की कायराना हरकत ने फिर हमें झिझोंड़ डाला। हम मुंह मोड़ ले रहे हैं। सिर्फ इतना भर पता करके संतोष कर ले रहे हैं कि धमाकों की जद में कहीं हमारा कोई लगा-सगा तो नहीं आ गया। कैसी विपदा में फंसे हैं हमारे भारत के अमनपसंद लोग। हमारी साझी विरासत को कैसे तार-तार कर रहे हैं सिरफिरे। राजधानी समेत देश के तमाम बड़े शहरों में हाई अलर्ट है। सिक्योरिटी सिस्टम मुस्तैद है। हमें भी मुस्तैदी दिखानी होगी। हमारे बीच ही छिपे हैं मासूमों के कातिल नमक हराम। स्लीपर सेल को जमींदोज करने को हमें जागना होगा। ये खबर का विषय नहीं है। मीडिया जगत और सरकारी प्रचार तंत्र से भी गुजारिश है कि कैसे हुए धमाके....इन खबरों के बजाए हमें रोज-ब-रोज याद दिलाएं कि कोई चुटकी भर बारूद रखकर हमारी तबाही का खेल-खेलने की साजिश तो नहीं रच रहा। वरना हमारे चीथड़े यूं ही उड़ते रहेंगे।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2008

भीड़तंत्र और सिर पर मंडराता मौत का साया...

एक खबरिया चैनल पर आज शाम दो लाइव शॉट देखकर मन दो तरह का हुआ॥ थोड़ा खिन्न और थोड़ा भयाक्रान्त। सचमुच ऐसा ही है या सचमुच ऐसा नहीं है। क्या जैसा है,,वैसा दिखता है? और जैसा दिखता है..वैसा है?????सवाल कुछ कौंधते हैं..बिंब कुछ उभरते हैं..प्रतिबिंब भी। शॉट क्या थे ये तो सुन लीजिए।शॉट-एकराजधानी का मंडावली इलाका...,,,एक औरत...बेचारी..औरतों के बीच घिरी हुई..तमाम तमाशबीन..उनमें पुरुष भी। पहले एक महिला ने चप्पल उतारी और ताबड़तोड़ उस महिला पर बरसानी शुरू कर दी, फिर कोई हाथ साफ करने से चूका नहीं, उस भीड़ में न महिलाएं और न ही पुरुष..सभी उसको बेतहाशा पीटते रहे..फिर क्या वह चैनल वालों के हाथ लग गई..बेचारी..फिर तो मामला ऑन-लाइन हो गया..कौन-कौन नहीं आया लाइन पर..किरन बेदी साहिबा भी आईं। तीन चेहरे दिखे पहला चेहरा भीड़तंत्र का..दूसरा न्यूज कॉर्पोरेट तंत्र और तीसरा संचालक तंत्र यानी व्यवस्था का। उलझन में हूं,,,सोच रहा हूं..व्यवस्था में खोट है (जहां महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील और सीएम शीला जी हैं,,,और शायद उस इलाके की एमएलए भी आधी दुनिया से ही बिलॉंन्ग करती हैं) या ये भीड़तंत्र की साइकोलॉजी है? कुछ आप ही सुझाएं....समाधान...

शॉट-दोएक गोल्डन ईगल..किसी लड़ाके विमान के मानिंद सांय...सांय...सांय कर आसमान से गलबहियां करता हुआ।..उसने थोड़ा नीचे की ओर रुख किया और एक छोटी सी पहाड़ी पर घास चर रहे बकरी के बच्चे को पंजे में दबोचकर उड़ चला। इस सेंसेशनल शॉट के साथ कैच वर्ड भी था..घाटी पर मंडराती मौत...मैं थोड़ा सहम गया..कहीं बाज इंसान के बच्चों पर न हमलावर होने लगें। शाम को दफ्तर जाने के लिए निकला तो आकाश की ओर ताका,,कहीं ऊपर मौत तो नहीं मंडरा रही है..बगल वाले भाईसाहब को भी ताकीद कर आया था कि वे भाभीजी से बता दें कि बच्चे जब खुले आसमान के नीचे खेल रहे हों तो वे एक लग्गी लेकर उनकी सिक्योरिटी में लगी रहें।

सोमवार, 7 अप्रैल 2008

मां.. जगद्जननी हमारा पोषण करें..

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संसि्थता नमस्तस्यै॥नमस्तस्यै..नमस्तस्यै नमो नमः..........हे देवी मैं यथाशकित आपकी उपासना करते हुए यह कामना करता हूं कि आप संपूर्ण जगत में शक्ति, शांति और समृद्धि का संचार करें। मां आन्नपूर्णा..आप भुखमरी और दरिद्रता से आकुल व्याकुल प्राणियों को उबारें। भय और दहशत से तप्त संसार को शीतल छाया प्रदान करें.. मां शीतला। हे महिषासुर मर्दिनी आप संहार करें आसुरी प्रवृत्तियों का। हे हंस वाहिनी,, आप विद्या रूपी प्रकाश से संसार का तमस दूर करें। जगद्जननी आप इस प्रकार हमारा पोषण करें। मुझमें नहीं है सामर्थ्य आपको प्रसन्न करने की। आप विवेक दें या स्वयमेव प्रसन्न हों भवानी........।

शुक्रवार, 28 मार्च 2008

वाह रे लड़कपन....

आज दफ्तर में बैठे-बैठे प्रसंगवश बचपन का एक रोमांचक किस्सा चल निकला। ये मेरे जीवन के तमाम रोचक किस्सों में से एक खास है। आपने मेरा ब्लॉग खोल ही डाला है तो सुन ही डालिए। किस्सा सन १९९२ के आस-पास का है। मैं उस समय १०वीं क्लास पास कर ११वीं में गया था। १० वीं का इम्तहान दे रहा था तो पिताजी ने कहा, मन लगाकर पेपर दो, ठीक-ठाक नंबर लाओगे तो साइकिल मिलेगी इनाम में। खैर, ठीक-ठाक नंबर तो नहीं, मगर मैं पास हो गया। इनाम लायक काम तो किया नहीं था, सो इसकी आशा भी नहीं की..मगर ये क्या पापा ने साइकिल दे ही दी..कहा..तुम पास हो गए...मेरे लिए यही बहुत है। चलो..भइया साइकिल मिली..हरे-हरे रंग की..एटलस गोल्ड लाइन..मेरी तो बस बांछे ही खिल उठीं..सवार हुआ और शेखी बघारने चल दिया सबसे आजीज दोस्त के पास..वहां उसके घर के सामने साइकिल खड़ी की और घर में चला गया..लौटा तो साइकिल नदारद..पैरों तले जमीन खिसक गई। दोस्त से कहा,,बहुत तोड़ाई होगी यार घर पर..पिताजी न गिराकर मारेंगे। दोस्त इमोशनल हो गया,,बोला परेशान मत हो,,,आज चचा से कह देना कि मैने ले ली है साइकिल..कल के लिए कुछ जुगाड़ करूंगा। मैंने घर पर वैसा ही बहाना बनाया। दूसरे दिन फिर मीटिंग हुई उसी हमराज दोस्त के साथ..हुं,,क्या किया जाए..हम लोग उस समय जीआईसी फैजाबाद के कैंपस में थे। यकायक उसकी आंखें चमकीं और उसने मुझसे कहा..तुम गेट पर पहुंचो..मैं आ रहा हूं..पांच मिनट में वह एक साइकिल लेकर हांफता-डांफता पहुंचा..बोला..लेकर भाग इसे..मैं तो सहम उठा..इतना ढीठ नहीं था..उसने फिर कहा,,भाग नहीं तो तू मुझे भी पिटवाएगा..मैंने दुस्साहस बटोरा और भाग निकला साइकिल लेकर..ठीक-ठीक याद है मुझे..साइकिल के पैंडल ही नहीं चल रहे थे मुझसे..हांफ गया चार मीटर की दूरी पर ही..लगा आभी गिर पड़ूंगा..उफ..किसी तरह घर पहुंचा और साइकिल तो डाल दी भुसैले में(जहां भूसा रखते हैं)। पसीने से तरबतर..बाहर आया..देखा कि कोई पीछा करके घर तक तो नहीं आ गया..न न न कोई नहीं..फिर भी चैन नहीं। घर में गया तो मां ने पूछा क्या बात है..काहे परेशान हो? कहा..कुछ नहीं..साइकिल....। साइकिल क्या? उन्होंने फिर पूछा..मैंने कहा..पंक्चर हो गई है.पैदल लाया..इसलिए थक गया.. मां बेचारा क्या जाने हमारा चौआल..बोली तो आराम कर लो..खानापीना खाकर। साइकिल १५ दिनों तक भुसैले में ही पड़ी रही..मैं उसे निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। इस बीच पिताजी ने कई बार तगादा किया कि ...का हो..सइकिलिया का भई॥ अभी दोस्तवै के पास है..बहुत बड़े दानी हो..हमका बीए तक नहीं मिली थी साइकिल..। तरसते होते तो पता चलता..। मैंने कहा,,साइकिल तो ले आया पापा..पर एक गड़बड़ी हो गई..पिताजी बोले क्या..मैंने कहा..दोस्त ने कहीं गलती से बदल दी..बहुत खफा हुए..मगर बाद में शांत हो गए। मगर मेरा मन नहीं शांत हुआ..अभी भी..जब वो किस्सा याद आता है तो हलचल सी मचती है। वो मेरा मासूम चोर दोस्त फिलवक्त टाई बांधकर घूमता है,एमआर है,,मैं भी समाज का एक जिम्मेदार पेशेवर हूं..दोनों जब कभी मिलते हैं तो यह वाकया फिर ताजा हो जाता है..दोस्ती के बंधन में एक मजबूत गांठ और कस उठती है..मगर गलत था..वह..बिलकुल गलत..कभी कोई हालात ऐसी जरूरी चोरी करने के लिए फिर न उकसाए..न उसे न हमें और किसी को भी नहीं।।

सोमवार, 17 मार्च 2008

बुरा तो मानो होली है भइया..

हुल...हुल..हुल ..हुल हल्ला हुल हुल.....होली है भाई होली है...बुरा न मानो होली है..बुरा मान भी सकते हैं मने किकुछ न कुछ तो मानना ही पड़ेगा आपको..बुरा या भला..बुरा मानेंगे तो उसमें भी एक जुडाव छुपा होता है..वरना साहब सड़क चलते कौन किस से नाराज होता है..होता भी है तो मार ही डालता है। हम ख़बर नवीसों को अक्सर ऐसे किस्से मिलते हैं छपने को..कोई नाराज हो किसी से और फिर कोई उसे मनाये..गिले शिकवे साझा हों , फिर एलास्टिक के तन्तु के मानिंद खिंचाव हो और एक दूजे से फिर सटाक से चिपक जायें...अहा आहा..क्या कभी आपने ऐसा सुख महसूसा है...नहीं तो दुर्भाग्य॥
चलो देखते हैं कि पिछले ३१ सालों में कैसे बदली होली..मैं अब ३१ साल का हूँ.. सन ८३ कि होली मुझे याद है..हलकी हलकी धुंध सी स्मृति है..होली तब se ab badrang हुई है कि और चटख ..इस बारे में मनन कर रहा हूँ.. अब दिल्ली में हूँ..तब अपने आँगन मे था..लाल-पीली नीली काले धब्बे..हरे चटख रंगों वाली साड़ी पहनकर जब फागुन रानी आती थीं तो लगता था कि अपने साथ लाया हुआ उल्लास और उत्साह से भरा बक्सा उन्होंने खोल दिया जो पूरी फिजां में तैर जाती थी..ओफ्फो ,,,गज़ब की मिठास घुली रहती थी..पूरे माहौल में । जब मैं बच्चा था तो फागुन रानी मुझे अपनी माँ जैसी लगती थीं, किशोर हुआ तो सुंदर लड़की, फिर प्रेयसी॥
''''होली खेलें रघुबीरआ अवध में होली खेलें रघुबीरा...'''''सुबह से ही ढोल मजीरे लेकर मस्त फाग की टोलियाँ घर-घर जाकर धमाल मचाती। अब शोर थम गया है..पिता जी नहीं रहे..पुद्दन चाचा भी और सरजू दादा..भी उमर पूरी कर चले गए..कौन बजाये अब ढोल..परधान जी के लौंडे ने चन्दा इकट्ठा किया..ऑर्केस्ट्रा और dजे मंगाया..वहाँ बवाल हो गया....थम गया सिलसिला
सिर फूट गये कई लोगों के पुलिस आई गांव में फौजदारी हो गई। जमाना खराब हो गया॥कोई घर से बाहर नहीं निकलता होली के दिन..आरे सब घुप्प..बंद का हो चचा होली वोली न होए..आरे हटो कौन खेलने जाए लंफूसों के बीच में सब के सब साले दारू पिए हैं..और जो दारू पिए हैं होली तो उन्हीं की है..यानी जो मदहोश हैं...बे...होश हैं..होश में नहीं हैं तो होश वालों की होली कैसे होगी...
हमने तो रंग घोला और खुद ही आपने ऊपर डाल लिया॥कालिख उनके लिए रख छोड़ी है जो हमारे त्यौहारों को स्याह कर रहे हैं..कमीने लोग..
''''गंध नहीं है आब बची टेसू के फूलों में..दुर्गध फैला रहे हैं सिरफिरे 'तमाम..'''

मंगलवार, 11 मार्च 2008

हाँ,हाँ, विदेश में ऐसे ही होतें हैं बंगला गाड़ी

मिस्सिसिपी जल रहा है, मिस्सिसिपी इज बरनिंग...... एक अंग्रेज़ी अखबार में मैंने पहले पन्ने पर लीड स्टोरी पैकेज पढी, स्टोरी का सार है कि भारत से एक साहब ये सपना संजोकर निकले कि उन्हें अमरीका में खूबसूरत सा बंगला, लक्जरी गाड़ी और आकर्षक सैलरी पैकेज मिलेगा, वहाँ पहुंचे तो उन्हें जेल से बदतर ज़िंदगी गुजारनी पड़ी,,जेल में तो कम से कम ताज़ा खाना मिल जाता है ,मगर वहाँ तो बासी भी सुकून से नहीं मिला। एक बाड़े में उन्हें और उनके जैसे २४ साथियों को कैद कर लिया गया था..ख़बर छपने के बाद भारत सरकार ने इसका संज्ञान लिया औरk अमेरिका इ से हस्तक्षेप करने को कहा गया गया है। खैर....ये एक झलक है बस, कैसे सात समंदर पार ज़िंदगी होती है ..कमोबेस यही हालात कनाडा, ब्रिटेन, दुबई, सौदी अरब, जैसे देशं में भी है सवाल बड़ाहै कि क्या हमें ग्लोबल विल्लेज के दौर में भी देश में बन्धकर रह ना चाहिए या फिर नए आकाश में उड़न भरनी चाहिए। बात विदेश की ही क्यों ...करें...apne desh men kaun sa pardesiyaon ko khuli hawa men saans lene diya ja raha hai ...

kawi rajesh joshi ke shabdon men kahen to

hamen hamare bachpan se judi har cheej se door le jaya gaya, hamen hamari galiyon, patiyon chaurahon se bahar nikala gaya..bahut tuchchi jarooraton ke badle cheena gaya hamse hamara itna kuchh,,kise se kahen to kahega vyarth hi bhawuk ho rahe ho tum..jagahon se payar karne kaa riwaj to kab ka khatm ho chuka hai..

बुधवार, 5 मार्च 2008

टूटे न हुलास का सिलसिला..

पडाव बदलने की आपाधापी कहें या मेरा आलसीपन , लंबे समय से “ अहा हुलास” की हाल -ख़बर नहीं ले paya. अब जीवन कुछ dharre पर to चलो करते हैं कुछ हुलास भरी बातें...

रविवार, 30 दिसंबर 2007

जब नये साल का सूरज उगे

जब नये साल का सूरज उगे to..कुछ ऐसा हो...की बिला जाये अँधेरा ज़िंदगी का.. सूरज की रश्मि जब यौवन पर आये to जवान हो जाएं हमारी आकाक्षाएँ hआर हाथों मी काम हो..सबकी सजीली शाम हो
नया साल kuchh इस तरह हो नया..

शनिवार, 1 दिसंबर 2007

jivan men ullas aur hulas

aao sahejen un anmol palon ko jo ghari-dar-ghari hamari zindagi ko jodti hai.
man ka hua to achcha man ka na hua to aur bhi achcha. jo man ka ho use bhi sajah karen aur jo man ka na ho use bhi.
pawan tiwari